Those 3 incidents, due to which money started raining in Indian cricket | राजदीप सरदेसाई का कॉलम: वो 3 घटनाएं, जिनसे भारतीय क्रिकेट में पैसा बरसने लगा


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4 घंटे पहले

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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar

राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

यह खबर कि टी20 विश्व कप जीतने वाली टीम को बीसीसीआई द्वारा 125 करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि दी जाएगी, एक बार फिर याद दिलाती है कि खेल अब कितना बदल गया है। 1950 और 60 के दशक में, भारतीय टेस्ट खिलाड़ियों को प्रति मैच 250 रुपए का भुगतान किया जाता था!

एक बार जब भारत ने न्यूजीलैंड को एक मैच में तीन दिनों में हरा दिया, तो खिलाड़ियों को केवल 150 रुपए दिए गए। कारण, खिलाड़ियों के साथ दिहाड़ी मजदूरों जैसा व्यवहार किया गया था और पांच दिवसीय मैच के दो दिन पहले समाप्त होने पर बोर्ड ने 100 रुपए काट लिए थे!

1983 में जब भारत ने पहली बार विश्व कप जीता, तब कपिल देव की टीम के खिलाड़ियों को 20,000 रुपए दिए गए थे। उस समय लता मंगेशकर ने एक संगीत समारोह आयोजित किया था, जिसकी आय भी खिलाड़ियों को दी गई। लेकिन उसको मिलाकर भी वह राशि खिलाड़ियों और यहां तक कि सहयोगी स्टाफ को भी आज मिलने वाले करोड़ों के आसपास भी नहीं थी।

खिलाड़ियों पर होने वाली पैसों की बारिश यकीनन तब और अब के भारतीय क्रिकेट में आया सबसे बड़ा परिवर्तन है। बात केवल अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की ही नहीं है, जिनके पास करोड़ों के अनुबंध और कई अन्य लाभ हैं, घरेलू खिलाड़ी भी अब अच्छी कमाई कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए रणजी ट्रॉफी के लिए, बीसीसीआई वर्तमान में मैच फीस के रूप में प्रतिदिन 40,000 से 60,000 रुपए के बीच भुगतान करता है। ऐसे में पूरे घरेलू सत्र में खेलने वाला खिलाड़ी 30 से 40 लाख रुपए कमा सकता है। इसकी तुलना 1960 के दशक के रणजी खिलाड़ियों से करें, जिन्हें प्रति गेम 10 रुपए का भुगतान किया जाता था! उस पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए एसबीआई या टाटा में नौकरी ही जीवन-रेखा थी।

भारतीय क्रिकेट में इस करोड़पति राज को लाने वाले तीन निर्णायक क्षण हैं। नि:संदेह, पहला 1983 की जीत थी, जिसके सिर्फ चार साल बाद विश्व कप पहली बार इंग्लैंड की धरती से बाहर भारत में खेला गया।

दूसरा मोड़ 1990 के दशक की शुरुआत में आया, जब आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्ताओं की तादाद में उछाल के साथ-साथ ‘ओपन स्काई’ नीति भी आई, जिसने सैटेलाइट टेलीविजन क्रांति की शुरुआत की। इसने खिलाड़ियों को अपनी ब्रांड वैल्यू का दोहन करने में सक्षम बनाया।

विशेष रूप से सचिन तेंदुलकर टीवी पर विभिन्न उत्पादों के लिए विज्ञापन-शुभंकर बन गए। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2008 में आया, जब आईपीएल की शुरुआत हुई। भारतीय क्रिकेट अब एक वैश्विक घटना बन गया था। आज सभी आईपीएल टीमों की कीमत अरबों डॉलर में है और यह अब दुनिया की दूसरी सबसे अमीर स्पोर्ट्स-लीग बन गई है।

आश्वस्त करने वाली बात यह है कि क्रिकेट की तेजी से हो रही वृद्धि का धीरे-धीरे सभी खेलों पर कई गुना असर हो रहा है। हमारे 2024 के ओलिम्पियन भी अब अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में बेहतर वेतन और प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।

जय शाह की अगुआई वाली बीसीसीआई पर बहुत कुछ गर्व किया जा सकता है, खासकर जिस तरह से उसने पिछले कुछ सालों में महिला क्रिकेट का समर्थन किया है और महिला क्रिकेटरों के लिए समान वेतन और महिला प्रीमियर लीग की स्थापना की है।

इसके बावजूद बीसीसीआई एक सख्ती से नियंत्रित की जाने वाली अपारदर्शी संस्था बना हुआ है, जिसका प्रबंधन राजनीतिक रूप से वेल-कनेक्टेड अधिकारियों के समूह द्वारा किया जाता है। उनके पास बहुत कम जवाबदेही है और खेल पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव है।

बीसीसीआई भारतीय क्रिकेट का संरक्षक है, लेकिन वह उसका मालिक नहीं है और वह आईपीएल जैसी व्यावसायिक फ्रेंचाइजी भी नहीं है। उससे खेल की बेहतर परंपराओं को बढ़ावा देने की उम्मीद की जाती है, जिसमें खिलाड़ियों और प्रशासकों के बीच भूमिकाओं का स्पष्ट विभाजन हो। जब बोर्ड के अधिकारी ‘इंडिया चैंपियन’ टी-शर्ट पहने हुए खुली छत वाली बस में कप जीतने वाले खिलाड़ियों के साथ शामिल हुए, तो खिलाड़ी और प्रशासक के बीच की रेखाएं टूट गई थीं।

पुनश्च : इस पखवाड़े विम्बलडन ने हमें फिर से दिखाया कि वह अनोखा खेल आयोजन क्यों है। उसके रॉयल बॉक्स में विभिन्न खेलों के दिग्गजों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, जिनमें भारत रत्न सचिन तेंदुलकर भी शामिल थे। लेकिन वहां पर कोई भी अधिकारी या बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां मुख्य मंच पर नहीं थीं। भारतीय क्रिकेट को इससे सबक सीखना चाहिए।

आश्वस्त करने वाली बात यह है कि क्रिकेट की तेजी से हो रही वृद्धि का धीरे-धीरे सभी खेलों पर कई गुना असर हो रहा है। हमारे 2024 के ओलिम्पियन भी अब अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में बेहतर वेतन और प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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