The threat of crisis is decreasing, now no prayer will fall from our hands | संकट की धमक कम होती जा रही है, अब कोई दुआ हमारे हाथों से गिरेगी नहीं

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2 दिन पहले

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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर - Dainik Bhaskar

नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर

मौतों से लिपटी हुई अखबारी सुर्खियां अब बंद हो चुकी हैं। बाजार खुल गए हैं। हम सब चल पड़े हैं। नियमों और अनुशासन को तहस-नहस करना हमारी परम्परा भी है और शौक भी। तीसरी लहर की आशंकाओं को रौंदते हुए हम इस नियम तोड़ूं परम्परा को बनाए रखने और शौक को पूरा करने के लिए दोगुने उत्साह से आमादा हैं। बाजारों में बिना मास्क भीड़ देखकर तो यही लगता है।

सही मायनों में हमारा मन एक दूधिया बादल है जो अपने शक्ति-कणों से सघन होकर सारे आसमान में विचरता रहता है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि यही मन खुद वो पवन भी है जो बादलों की दिशा मोड़ देता है या उन्हें दिशा-मुक्त कर देता है। इतिहास कहता है कि समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले थे। लेकिन आज वक्त की जरूरत है कि हम अपने- अपने मन-सागर का मंथन करें और अपनी सुरक्षा-आचरण शक्ति का रत्न खोज लें। यही वक्त का तक़ाज़ा है। हमें अपनी, अपने देश की इबारत अक्षर-अक्षर टूटने- बिखरने नहीं देना चाहिए। दरअसल, इबारत दो तरह की होती हैं।

एक वह जो बाहर की घटनाएं, ज़िंदगी के कागज पर लिखती है। लेकिन दूसरी इबारत वह होती है जो इंसान का अंतर्मन आत्मा के कागज पर लिखता है। निश्चित रूप से पिछले सवा साल के दरमियान हमारी आत्मा में कोरोना के सामने का अनुशासन गहरे तक पैठ कर गया है। इसे ऐसे ही बनाए रखना हमारा धर्म है और होना ही चाहिए। बाजार कितना ही खुल जाए, कमाई या खरीदारी के कितने ही साधन उपलब्ध हो जाएं, पर हमें आसमान बेचकर चांद नहीं कमाना चाहिए।

हैरत की बात यह है कि मास्क और वैक्सीन की परवाह किए बगैर कुछ लोग, बल्कि कहना चाहिए बड़ी संख्या में लोग इन दिनों ज्योतिषियों की शरण में पहुंच गए हैं। ज्योतिषी बता रहे हैं- शनि, मंगल के घर में बैठा हुआ है। अमुक ग्रह बृहस्पति से विमुख हो गए हैं। अष्टम दृष्टि से मंगल देख रहा है। शनि वक्रीय हो चला है, आदि।

वाकई में ज्योतिष मनीषियों से पूछना चाहिए कि ये जो छोटे-बड़े ग्रह हैं, आखिर सब के सब अपने घरों में क्यों नहीं रहते? जब मन करे, बेगानों के घर में क्यों चले जाते हैं?…और जो जाते भी हैं तो जाएं, उनकी मर्जी, वहां से दूसरे घरों में क्यों झांकते रहते हैं? जवाब जो भी हो, और जैसा भी हो, हमें अपने घरों में रहने से कोई ग्रह नहीं रोक सकता। सावधानी से बड़ी कोई दवा नहीं। कोई वैक्सीन नहीं।

वैक्सीन से याद आया कि देर से ही सही, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध कराने का ऐलान कर दिया है, लेकिन निजी अस्पतालों को जिस कीमत पर वैक्सीन दी जाएगी, उसमें इतना भारी भरकम अंतर क्यों है? कोविशील्ड और कोवैक्सिन की कीमत में दोगुना के अंतर से आम आदमी क्या समझे? इस अंतर के मूल में गुणवत्ता है या लागत का कोई फॉर्मूला? लोग इस अंतर को किस तरह समझें? स्पष्ट होना चाहिए। बहरहाल, संकट की धमक कम होती जा रही है। दुखों के तमाम महूरत टल रहे हैं। विश्वास है, हमारे हाथों से कोई दुआ अब गिरेगी नहीं। सबकुछ ठीक है और ठीक ही रहेगा।

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