Shekhar Gupta’s column – The power of Muslim votes has returned in these elections | शेखर गुप्ता का कॉलम: इन चुनावों में मुस्लिम वोटों की ताकत लौटी


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2 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

इस बार के लोकसभा चुनाव से उभरी इस हेडलाइन की ओर कम ही लोगों का ध्यान गया होगा कि मुस्लिम वोट की ताकत फिर से लौट आई है। जी नहीं, मुस्लिम सियासत या मुस्लिम नेतृत्व की ताकत नहीं बढ़ी है। हुआ सिर्फ इतना है कि मुस्लिम वोट ने अपनी ताकत फिर से पहचान ली है।

यूपी और बंगाल के नतीजों को देख लीजिए। दोनों राज्यों में ‘इंडिया’ गठबंधन के दलों का वोट प्रतिशत इस बार एनडीए से ज्यादा रहा। मुसलमानों ने एकजुट होकर मतदान न किया होता तो ऐसा न होता। पुराने एग्जिट पोलों और दूसरे अध्ययनों के नतीजे हमें यही बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता हमेशा भाजपा को हराने की रणनीति के तहत मतदान करते रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इसी बार वे इतने नाटकीय रूप से सफल क्यों हुए, खासकर यूपी में। और यह नीति बिहार और असम में क्यों सफल नहीं हुई, जबकि इन दोनों राज्यों में मुस्लिम मतदाता अच्छी संख्या में हैं और ‘इंडिया’ गठबंधन वहां तगड़ी चुनौती भी दे रहा था?

गौरतलब है कि मोदी के दौर में यूपी में जो तीन लोकसभा चुनाव (2014, 2019, 2024) हुए या 2017 और 2022 में जो विधानसभा चुनाव हुए, उनमें से किसी में भाजपा ने 80 लोकसभा सीटों या 403 विधानसभा सीटों पर अपना एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं खड़ा किया था। फिर भी उसे विशाल बहुमत मिलता रहा। तो अब यह नाटकीय उलटफेर क्यों हुआ?

यह भाजपा के लिए भी बड़ी चिंता का विषय है। पार्टी की इस भारी कमजोरी की खोज करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पक्ष में और विरोध में तलवारें खिंच गई हैं। खतरा यह है कि यूपी में स्थिति सुधारे बिना भाजपा का पतन और तेज होता जा सकता है।

बंगाल के नतीजों ने एग्जिट पोल वालों की साख खराब कर दी है और भाजपा के समर्थकों तथा विरोधियों को भी हैरानी में डाल दिया है। यूपी में तो मुसलमानों की आबादी 20 फीसदी है (सारे आंकड़े पूर्ण अंक में लिए गए हैं क्योंकि 2011 के बाद से जनगणना नहीं हुई है), लेकिन पश्चिम बंगाल में वे 33 फीसदी हैं।

फिर भी, वहां की 42 सीटों में से 2019 में भाजपा ने 18 जीती थी और इस बार अपना आंकड़ा काफी बढ़ाने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन उसे पिछले बार की आधी से थोड़ी ऊपर ही क्यों सीटें मिलीं? जिन राज्यों में भाजपा सीटें जीत सकती है, उनमें वह यह सीधा फॉर्मूला लागू करती है- हिंदुओं के 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट ले आओ तो जीत पक्की।

यह फॉर्मूला यूपी में भी चलता था और इस तरह 20 फीसदी मुस्लिम आबादी राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो जाती थी। बंगाल-असम में मुस्लिम आबादी ज्यादा होने की वजह से 60 फीसदी हिंदू वोट हासिल करना ता था।यह तो साफ है कि जब जिन्ना पाकिस्तान लेकर भारत से अलग हो गए, उसके बाद से भारतीय मुसलमानों ने अपने मजहब के किसी शख्स को अपना नेता नहीं माना, मौलाना आजाद को भी नहीं।

वे हमेशा अपने भरोसे के लायक हिंदू नेताओं की ओर देखते रहे। ज्यादातर तो वे कांग्रेस की ओर देखते रहे, जब तक कि 1989 में अयोध्या के विवादास्पद स्थल का ताला नहीं खोला गया था और उनका भरोसा नहीं टूटा था। उसके बाद यह वोट बैंक उन ताकतों की ओर मुड़ गया, जो उन्हें वैसी ही सुरक्षा देने का वादा कर रही थीं- मुख्यतः हिंदी पट्टी में पुराने लोहियावादी मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव और बंगाल में वाम दल।

महाराष्ट्र और केरल सहित दक्षिण भारत के दूसरे भागों में विकल्प उपलब्ध न होने के कारण मुसलमान कांग्रेस के साथ ही रहे। दूरदराज के कुछ इलाकों में जरूर मुस्लिम नेतृत्व उभरे, लेकिन मुसलमानों ने खुद जिन नए नेताओं को चुना, उन्हें वे सत्ता दिलाने में सफल नहीं हुए।

ये वो नेता थे, जिन्होंने हिंदुओं से मिलकर गठबंधन बनाए- मुलायम और लालू ने यादवों और कुछ पिछड़ी जातियों के साथ, बंगाल में वाम दलों ने निम्न वर्ग के हिंदुओं के साथ, तो विंध्य के दक्षिण में कांग्रेस ने अपने ठोस वोट बैंक के साथ।

यह तब तक चला, जब तक मुस्लिम वोट साढ़े तीन हिस्सों (सपा/राजद, बसपा, भाजपा और कांग्रेस) में बंटता रहा। तब आप उस विभाजन के तहत केवल 28-30 फीसदी वोट हासिल करके भी यूपी-बिहार पर राज कर सकते थे, जैसा कि मुलायम (2002), मायावती (2007), अखिलेश (2012) और लालू बार-बार दिखा चुके हैं।

इसमें चाल यह थी कि मुस्लिम वोट के साथ जाति आधारित एक-दो हिंदू वोट बैंक को जोड़ लो, और अपना खेल बना लो! मोदी के उभार ने इस फॉर्मूले को विफल कर दिया। यादव और मायावती को छोड़ कई हिंदू मोदी के साथ हो लिए। तो इस बार क्या बदल गया? मुसलमानों के उन्हीं हिंदू नेताओं ने पिछले पांच वर्षों में मुसलमानों के मसलों को जोरदार तरीके से नहीं उठाया।

भाजपा ने 2014 में सात और 2019 में तीन मुस्लिम उम्मीदवारों को खड़ा करने के बाद इस बार केवल एक को खड़ा किया, लेकिन यूपी में सपा ने चार और कांग्रेस ने दो, और बंगाल में ममता ने छह उम्मीदवारों को ही खड़ा किया। वे मुसलमानों पर अपनी निर्भरता को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहे थे। भाजपा को ध्रुवीकरण का फायदा नहीं उठाने दिया।

अब मुस्लिम फिर से उन पार्टियों की ओर लौट रहे हैं, जो सेकुलर गठबंधन और वोट बैंक का निर्माण कर सकें। असम में जातीय विभाजन न होने से कांग्रेस हिंदुओं में पैठ न बना सकी। बिहार में भाजपा के सहयोगियों, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने दलित वोटों को एकजुट रखा, पर मायावती यूपी में ऐसा नहीं कर पाईं।

हिंदू वोटरों से गठजोड़…
भाजपा ने जिस मुस्लिम वोट को राष्ट्रीय परिदृश्य में अप्रासंगिक बना दिया था, उसे इन चुनाव नतीजों, खासकर यूपी और बंगाल ने पलट दिया है। साथ ही, हिंदू वोटरों से गठजोड़ करके इस बार मुस्लिम वोट फिर से ताकतवर हुए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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