PM Modi in an effort to win back the trust of the people of UP | उप्र चुनाव लोगों का भरोसा दोबारा जीतने के प्रयास में प्रधानमंत्री मोदी

5 मिनट पहले कॉपी लिंक संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार जब महामारी की दूसरी लहर में गिरावट आ रही है, ऐसे में बीते सोमवार को प्रधानमंत्री …


5 मिनट पहले

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संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार

जब महामारी की दूसरी लहर में गिरावट आ रही है, ऐसे में बीते सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन को नागरिकों के विश्वास को जीतने के प्रयास 2.0 की तरह देखा जा सकता है। नाराज किसानों को मनाने के लिए वैश्विक कीमतें बढ़ने के बावजूद खाद पर सब्सिडी बढ़ाने की घोषणा प्रयास 1.0 था।

मुफ्त वैक्सीन की हालिया घोषणा भी उसी दिशा में कदम है। कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने 12वीं की परीक्षा स्थगित करने की घोषणा की थी, जिसकी काफी सराहना हुई। सरकार द्वारा पिछले कुछ दिनों में की गई घोषणाएं स्पष्ट रूप से इशारा करती हैं कि भाजपा 2022 की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले जनता को खुश करने का हर संभव प्रयास कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा फिर लोगों का विश्वास जीत पाएगी और क्या लोग उप्र में फिर पार्टी को वोट देंगे?

दूसरी लहर में बुरी तरह प्रभावित नागरिकों का विश्वास जीतना सरकार के लिए आसान नहीं होगा और यह उप्र में भाजपा के लिए परेशानी बन सकता है। लेकिन भाजपा के जनाधार को शायद इतनी चोट नहीं पहुंची कि वह हार जाए। भाजपा का वोट शेयर गिर भी जाए, जो भी उसे राज्य में बंटे हुए भाजपा-विरोधी वोटों का लाभ मिलेगा। चूंकि भाजपा के लिए अभी यह आंकलन मुश्किल है कि उसकी लोकप्रियता कितनी घटी है और इससे चुनावी संभावनाओं को कितना नुकसान होगा, पार्टी ने विश्वास 2.0 के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं।

केंद्र सरकार किसानों की मांग का समाधान निकालने में असफल रही है। बड़ी संख्या में जाट खेती से जुड़े हैं। खासतौर पर पश्चिम उप्र की सीटों में जाट वोटों के महत्व को और सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ नाराजगी को समझते हुए सरकार ने खाद (डीएपी) पर सब्सिडी बढ़ाकर किसानों को खुश करने का पहला कदम उठाया। यह खोया हुआ विश्वास पाने का प्रयास 1.0 था।

किसान अब भी धरने पर बैठे हैं, यानी इससे किसानों को खुश करने में ज्यादा मदद नहीं मिली। फिर 2.0 में सरकार ने खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 50% तक बढ़ाने की कोशिश की। ये दोनों फैसले एक ही दिन लिए जा सकते थे, लेकिन सरकार किसानों को खुश करने के लिए एक-एक कदम बढ़ना चाहती है।

मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए सीबीएसई 12वीं की परीक्षाएं रद्द करने के फैसले पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है, लेकिन लगता है कि सरकार इस फैसले का इस्तेमाल भी नागरिकों को विश्वास जीतने में कर रही है। इस बैठक की अध्यक्षता आसानी से शिक्षा मंत्री कर सकते थे, लेकिन ऐसा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने किया। घोषणा के बाद छात्रों व माता-पिता से उन्होंने संवाद किया, यह भाजपा का रणनीतिक प्रयास ही था। जबकि इस घोषणा के बाद जल्द मूल्यांकन के मापदंड तय करने के लिए बैठक होनी चाहिए थी, लेकिन लगता है कि ध्यान लोगों के बीच विश्वास पैदा करने पर ज्यादा था।

पिछले हफ्ते विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच टीके से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर वाद-विवाद हुआ जो आगे जाकर दोषारोपण में बदल गया कि टीके की कमी के लिए कौन जिम्मेदार है। यह सही है कि सरकार ने दो महत्वपूर्ण फैसले लिए थे- पहला वैक्सीन खरीदने और बांटने के बारे में और दूसरा निजी अस्पतालों के लिए वैक्सीन के कोटा और कीमत से जुड़ा।

नए नियम के मुताबिक प्राइवेट अस्पतालों के लिए टीके का कोटा 50% से घटाकर 25% कर दिया, लेकिन इनकी घोषणा ऐसे की गई, जैसे सरकार ही 18 वर्ष से ऊपर वालों के लिए सभी मागरिकों को मुफ्त वैक्सीन देगी। यह भी नागरिकों का विश्वास जीतने का प्रयास था।

जबकि सरकार और राजनीतिक दल जनता का भरोसा जीतने के लिए प्रयास करने को आजाद हैं क्योंकि इससे पार्टी को चुनाव जीतने में मदद मिलती है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि विश्वास बढ़ाने के इस प्रयासों से कम से कम कुछ वास्तविक फायदा देश की आम जनता को मिलेगा।
(ये लेखक के अपने विचार)

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