Navneet Gurjar’s column – Porsche, father and son! Who is guilty after all? | नवनीत गुर्जर का कॉलम: पोर्श, पिता और पुत्र! आखिर दोषी कौन?


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2 घंटे पहले

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नवनीत गुर्जर - Dainik Bhaskar

नवनीत गुर्जर

19 मई। पुणे का कल्याणी नगर इलाका। यहां रहने वाले रियल एस्टेट डेवलपर विशाल अग्रवाल का नाबालिग (18 से कम उम्र) बेटा अपनी पोर्श कार से बाइक सवार दो इंजीनियरों को कुचल देता है।

परिणाम बेटा खुद बाल सुधार गृह में। पिता जेल में। दादा भी गिरफ्तार। आखिर यह क्यों हुआ? ऐसा होता ही क्यों है? कसूर उस तेज रफ्तार, महंगी कार का है? नशे में धुत होकर कार दौड़ा रहे उस बेटे का है? या उस पिता का जिसने नाबालिग बेटे की जिद के आगे हार मानकर उसको पोर्श की चाबी थमा दी? आसानी से कहा जा सकता है कि रईस बाप की औलादें ऐसी ही होती हैं।

पैसों के नशे में चूर।
बेमुरव्वत। बेखौफ…
और बहुत हद तक निर्दयी भी।
कहा जा सकता है कि रईस बाप को फर्क नहीं पड़ता। बेटे को बचाने के लिए वो कभी ड्राइवर को खरीदता है। कभी डॉक्टर्स को ब्लड सैंपल डस्टबिन में फेंकने को मजबूर करता है। पुलिस, न्याय व्यवस्था आदि को खरीदने की कोशिश भी करता है।

सही है, ऐसा अक्सर होता है। कोई अपनी इस मंशा में सफल होता है। कोई विफल। सवाल यह है कि इस पूरी समस्या की जड़ क्या है? क्या उस पिता ने अपने नाबालिग बेटे को कार ले जाने से मना नहीं किया होगा? जरूर किया होगा। लेकिन आजकल के जवान होते बेटे मानते कहां हैं? पिता भी बेटे और उसके दोस्तों के सामने कंजूस नहीं कहलाना चाहते। नहीं चाहते कि आज की पीढ़ी उन्हें पुरातन कहकर चिढ़ाए।

सकुचाते हैं कि उनके बच्चे ये न कहने लगें कि हमारे पिता तो कतरे-ब्योंते, सड़े-गले, नियम-सिद्धांतों की अंधी गली में खोए रहते हैं। यही सब सोचकर पिता कार की चाबी नाबालिग को देने पर मजबूर हो जाता है।

बच्चों की नजर में ‘प्रोग्रेसिव’ कहलाने की चाह उससे यह सब करवाती है।
लेकिन फिर पिता की सीरियसनेस सामने आती है। ड्राइवर साथ ले जाने की शर्त पर चाबी देता है लेकिन नशे में धुत बेटा ड्राइवर को पीछे बैठाकर गाड़ी उड़ाता है और उड़ जाते हैं निर्दोष लोगों के प्राण!
तो आखिर इसका निदान क्या?
सच है, सोलह-सत्रह की उम्र में जाना-पहचाना सबकुछ शरीर के वस्त्रों की तरह तंग हो जाता है।
होंठ जिंदगी की प्यास से खुश्क हो जाते हैं।

आकाश के तारे, जिन्हें बचपन में सप्त ऋषियों के आकार में देखकर दूर से प्रणाम करना होता है, पास जाकर छूने, बल्कि खीसे में डालने को मन करता है। इर्द-गिर्द और दूर-पास की हवा में इतनी मनाहियां, इतने इनकार और इतने विरोध होते हैं कि सांसों में आग सुलग उठती है।

युवा मन की यही आग पिता-दादा को मजबूर बनाती है और कभी-कभी सड़क चलते निरपराध की जान लेने पर भी बन आती है। होना यह चाहिए कि पिता अपनी सख्ती पर कायम रहे। बच्चे इस पितृात्मक अनुशासन की हंसी उड़ाने या उसे अपना अपमान समझने की बजाय हालात की गंभीरता को समझें।

निश्चित ही ऐसे हादसों से बचाव का उपाय बच्चों और पिता की गंभीर समझ से ही निकल सकता है। पुलिस, प्रशासन, थाने, ये सब तो सबूत बनाने और उन्हें मिटाने के उपक्रम में लगे रहते हैं।

वहां से किसी तरह के निदान की कल्पना करना बेमानी ही लगता है। कुल-मिलाकर पुणे की यह घटना देशभर के पिताओं और उनके जवान होते बच्चों के लिए एक सबक है।

एक हिदायत है…
और बहुत हद तक एक लक्ष्मण रेखा भी।

पिता सकुचाते हैं कि बच्चे उन्हें पुरातन न समझ बैठें…
क्या पिता ने बेटे को कार ले जाने से मना नहीं किया होगा? जरूर किया होगा। पर आजकल के जवान होते बेटे मानते कहां हैं? पिता भी नहीं चाहते कि आज की पीढ़ी उन्हें पुरातन कहकर चिढ़ाए।

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