N. Raghuraman’s column – Technology is good as long as it doesn’t make mistakes! | एन. रघुरामन का कॉलम: टेक्नोलॉजी तभी तक अच्छी है जब तक कि गलतियां नहीं करती!


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4 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

पहला दृश्य : लंदन में एक रिटेल स्टोर का सुरक्षा अधिकारी हांफता हुआ अपनी कुर्सी पर बैठ गया। स्टोर से सामान चोरी करके ले जाने वाले तीन लोगों का पीछा करने में वह असफल रहा था। पुलिस के पहुंचने से पहले वह कंप्यूटर टेबल पर बैठा, सिक्योरिटी कैमरे से फुटेज निकाले, उन पर जूम-इन किया और तीनों चोरों की तस्वीरें सेव कर लीं।

इसके बाद उसने चेहरा पहचानने वाले (फेशियल रिकग्निशन) प्रोग्राम फेसवॉच पर लॉगइन किया और तस्वीरों को मेन सर्वर पर डाला, इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल यह स्टोर ऐसे चोरों की पहचान के लिए करता है। अब अगली बार जब भी वो लोग किसी दुकान में प्रवेश करेंगे, जहां फेसवॉच है, तो उस स्टोर के स्टाफ को अलर्ट मिल जाएगा।

दूसरा दृश्य : चेहरा ढंके एक महिला, एक टीवी चैनल पर बुझे मन से अपनी कहानी बता रही थी। वह कह रही थी, मैं घर जाते समय पूरे रास्ते ये सोचकर रोती रही कि आज से मेरी जिंदगी पहले जैसी नहीं रहेगी। मुझे दुकान से सामान चुराने वालों की तरह देखा जाएगा, जबकि मैंने अपनी जिंदगी में दुकान से कभी कुछ नहीं उठाया। लोगों से भरी पूरी दुकान के सामने अपराधी करार दिए जाने से मैं परेशान-अपमानित महसूस कर रही हूं।

इस हफ्ते के इन घटनाक्रमों पर मैंने गहराई से जानने की कोशिश की। मालूम चला कि पूरे ब्रिटेन में फैले स्टोर की चेन “होम बार्गेन्स’ के कर्मचारी ने 19 वर्षीय एक लड़की को स्क्रीन में देखकर दुकान से सामान चोरी करने का आरोप लगाया।

स्टाफ को फेसवॉच ने इस ग्राहक के बारे में अलर्ट कर दिया। बारी-बारी से जूनियर व सीनियर कर्मचारियों ने उस महिला की तलाशी ली कि कहीं उसने कुछ छुपाकर तो नहीं रखा। लेकिन उनको उसके पास से कुछ नहीं मिला। क्योंकि सॉफ्टवेयर ने गलती से उसके चेहरे को चिह्नित किया था।

पर अब बड़ी समस्या ये है कि टेक्नोलॉजी ने गलती से जिस महिला को संदेह में ला दिया, अब वो किसी भी स्टोर में खरीदारी नहीं कर सकती, जब तक कि यह सुनिश्चित नहीं कर लेती कि वो जिस स्टोर में जा रही है, वहां फेसवॉच (क्लाउड आधारित फेशियल रिकग्निशन सिक्योरिटी सॉफ्टवेयर) नहीं है। क्योंकि उसी तकनीक का प्रयोग कर रहे हर स्टोर में उसका चेहरा संदेहास्पद दिखाया जाएगा। अगर आप भी फोन में ट्रू-कॉलर जैसा एप इस्तेमाल कर रहे हैं तो टेक्नोलॉजी के इस फंक्शन से ज्यादा रिलेट कर पाएंगे।

कंपनी ने माना कि उनसे गलती हुई है। पर विकसित देशों में ऐसे मामले बढ़ रहे हैं जहां राह चलते निर्दोषों की पुलिस ‘वांटेड’ के रूप में शिनाख्त कर लेती है। ऐसे ही एक मामले में, 38 वर्षीय शॉन थॉम्पसन को अधिकारियों ने रोका और उसे बताया कि वह वांटेड है। तुरंत उसके फिंगरप्रिंट लिए गए, 20 मिनट से अधिक तक पूछताछ की गई और पासपोर्ट की प्रति जमा करने के बाद ही उसे रिहा किया गया।

उतनी देर तक लोगों की नजर में वह अपराधी रहा, जब तक कि उसने खुद को निर्दोष साबित नहीं कर दिया। हालांकि ब्रिटेन की सरकार फेशियल रिकग्निशन सहित पुलिस टेक्नोलॉजी पर करोड़ों खर्च कर रही है, पर पुलिस मानती है कि इस साल अब तक हर 40 अलर्ट में से एक में गलती हुई है।

फेशियल रिकग्निशन सतर्कता को ब्रिटेन में पहली बार चुनौती देते हुए आरोपी लड़की ने डिजिटल अधिकार समूह ‘बिग ब्रदर वॉच’ की मदद से फेसवॉच व उस स्टोर को कोर्ट में घसीटा है। ग्रुप ने कहा कि वे थॉम्पसन की भी मामला दायर करने में मदद कर रहे हैं।

फंडा यह है कि काम में तेजी लाने के लिए तकनीक अच्छी है, लेकिन जब यह गलतियां करती है तो एक व्यक्ति के जीवन को संकट में डाल देती है। इसलिए यह देखना इंसानों की जिम्मेदारी है कि टेक्नोलॉजी कोई गलती न करे।

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