मोदी सरकार 3.O में लोकसभा स्पीकर का पद क्यों है इतना खास? आखिर कैसे चुने जाते हैं ये और कितनी होती है शक्तियां


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मोदी सरकार 3.O में लोकसभा स्पीकर का पद क्यों है इतना खास?

नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह बीती शाम संपन्न हो गया है। रिजल्ट जारी होने के 5वें दिन पीएम मोदी व उनके 72 मंत्रियों की पूरी कैबिनेट का शपथ ग्रहण संपन्न हो गया है। इस सरकार में बीजेपी और दो जरूरी सहयोगियों (टीडीपी व जेडीयू) की भूमिका अहम मानी जा रही है, क्योंकि इनके बाद बीजेपी 272 का आंकड़ा नहीं छू पाती। ऐसे में बीजेपी ने अपने दोनों प्रमुख सहयोगी दलों टीडीपी और जेडीयू को दो-दो मंत्री पद दिए हैं- एक कैबिनेट रैंक का और एक राज्य मंत्री का पद।

टूट सकता है बलराम जाखड़ का रिकार्ड

पर अभी भी एक अहम सवाल बना हुआ है, आखिर कौन बनेगा लोकसभा स्पीकर? या किस पार्टी के हिस्से जाएगी लोकसभा स्पीकर की सीट? हाल ही में कई रिपोर्ट्स ने दावा किया टीडीपी ने लोकसभा स्पीकर पद की मांग की है, पर बीजेपी सूत्रों की मानें को बीजेपी यह पद अपने किसी भी सहयोगी दल को देने की इच्छुक बिल्कुल भी नहीं है। यदि फिर से ओम बिरला स्पीकर चुने जाते हैं और इस पद पर वे अपना दूसरा कार्यकाल भी पूरा कर लें तो बलराम जाखड़ का बनाया रिकार्ड टूट जाएगा। बता दें कि बलराम जाखड़ एकमात्र ऐसे स्पीकर रहे हैं तो 2 बार चुने गए और कार्यकाल भी पूरा किया। सबसे पहले आइए जानते हैं कि आखिर कैसे चुने जाते है लोकसभा स्पीकर?

कैसे चुने जाते हैं लोकसभा स्पीकर?

संविधान के मुताबिक, नई लोकसभा के पहली बार बैठक से ठीक पहले अध्यक्ष का पद खाली हो जाता है। सदन के वरिष्ठ सदस्यों में से राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रोटेम स्पीकर नए सांसदों को पद की शपथ दिलाते हैं। इसके बाद, सदन के सदस्यों में से एक बहुमत से अध्यक्ष चुना जाता है, वैसे तो लोकसभा अध्यक्ष के रूप में चुने जाने के लिए कोई विशेष मानदंड नहीं है, लेकिन संविधान और संसदीय नियमों की समझ होना एक फ़ायदेमंद बात है। पिछली दो लोकसभाओं में, जिनमें भाजपा का बहुमत था। इस कारण बीजेपी ने सुमित्रा महाजन और ओम बिड़ला को लोकसभा स्पीकर अध्यक्ष बनाया था। पर अब जब बीजेपी के पास खुद का बहुमत नहीं है तो रिपोर्ट के मुताबिक, कहा जा रहा कि एनडीए के सहयोगी दल इस पद की लालसा लगाए बैठे हैं।

क्यों अहम है सभी पार्टियों के लिए पद?

  • लोकसभा स्पीकर एक संवैधानिक पद है। उसकी मंजूरी के बिना सदन में कुछ भी नहीं होता।
  • लोकसभा स्पीकर काफी खास पद है। इनका फैसला ही आखिरी फैसला होता है। संसद में इनकी निर्णायक भूमिका होती है।
  • बहुमत साबित करने के दौरान जब दल-बदल कानून लागू होता है तो ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका और बढ़ जाती है।
  • संसद को स्थगित करने से लेकर किसी को सस्पेंड करने तक हर अधिकार स्पीकर के पास होते हैं।
  • स्पीकर के पास संसद के सदस्यों की योग्यता और अयोग्यता का फैसला करने का पूरा अधिकार होता है। चाहे कोई रेजिल्यूशन हो, मोशन या फिर सवाल, स्पीकर का फैसला निर्णायक होता है।

उदाहरण से समझें स्पीकर की शक्ति

साल 1998 की लोकसभा चुनावों में किसी भी पार्टी को जनता ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया। भाजपा 182 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी। अटल बिहारी वाजपेयी को केंद्र में अपनी सरकार बनाने के लिए टीडीपी से बाहरी समर्थन मिला तो फिर सत्ता में एनडीए सरकार आ गई। फिर जब जयललिता की AIADMK ने अटल सरकार से अपना समर्थन वापस लिया तो अटल सरकार अल्पमत में आ गई। उस समय स्पीकर टीडीपी के हिस्स में थी और टीडीपी ने जीएमसी बालयोगी को लोकसभा स्पीकर बनाया था। फ्लोर टेस्ट हुआ पक्ष में 269 वोट गिरे जबकि विपक्ष में भी 269 वोट गिरे थे, फिर स्पीकर ने कांग्रेस सांसद गिरधर गमांग को वोट डालने की अनुमति दी थी। फिर 1 महज 1 वोट से अटल जी की सरकार गिर गई। 

बता दें कि उस समय गिरधर बिना इस्तीफा दिए ओडिशा के सीएम बन गए थे, और वोटिंग के दिन वह सदन में मौजूद थे। ऐसे में विवेक के आधार पर लोकसभा स्पीकर ने उनको वोट डालने की परमिशन दी थी। हालांकि तत्कालीन लोकसभा स्पीकर चाहते तो गिरधर गमांग को वोट डालने से रोक भी सकते थे। हां तो अब ये होती है स्पीकर की पावर, जिसकी वजह से टीडीपी और बीजेपी अपना-अपना स्पीकर बनाना चाहती हैं।

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