Home delivery scheme of ration may increase corruption in Delhi, return of Aadhaar verification will deprive ration | दिल्ली में राशन की होम डिलीवरी योजना से भ्रष्टाचार बढ़ सकता है, आधार सत्यापन की वापसी राशन से वंचित करेगी

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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री - Dainik Bhaskar

रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री

दिल्ली की लगभग 2500 राशन की दुकानों में से 42 पर दिल्ली सरकार ने 2016 में प्रयोग के रूप में पॉइंट ऑफ सेल (पॉस) मशीन और आधार सत्यापन शुरू किया। तब सर्वे में पाया गया कि सुप्रीम कोर्ट के पास जन वितरण प्रणाली की दुकान पर एक तिहाई राशन कार्डधारक अगस्त में राशन नहीं ले पाए।

जो राशन ले पाए, उन्हें उनके हक से कम अनाज (86%) मिल रहा था और दाम ज्यादा वसूला जा रहा था। आधार संबंधित दिक्कतों के बावजूद संभवतः केंद्र सरकार के दबाव के चलते ही जनवरी 2018 में दिल्ली सरकार ने आधार सत्यापन को सभी 2500 दुकानों में लागू किया।

पहले महीने में एक रिपोर्ट आई जिससे पता चला की हजारों परिवारों का आधार के चलते राशन रुक गया है। पॉस मशीन उनकी उंगलियों के निशान नहीं पहचान पा रही थी और राशन डीलर या कोटेदार उन्हें राशन नहीं दे पा रहे थे। तब दिल्ली सरकार ने तुरंत सही उपाय निकाला और आधार सत्यापन को हटा दिया गया। लेकिन उस समय से दिल्ली सरकार अनाज की ‘डोर स्टेप डिलीवरी’ की जिद पकड़कर बैठी है।

इसका मतलब यह है कि लोगों को दुकान के बजाए घर पर राशन पहुंचाया जाएगा। सुनने में तो यह बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसके विस्तार में जाएं तो अनेक जटिल सवाल उठते हैं। यदि घर पर राशन देंगे तो इस बात की पुष्टि कैसे होगी कि राशन पहंुचा है। इसके दो विकल्प हो सकते हैं। पहला, घर पर आधार से सत्यापन हो, लेकिन इससे फिर से 2018 वाली दिक्कत आ जाएगी- जिसकी उंगलियों के निशान नहीं मिलेंगेे, वह छूट जाएंगे। दूसरा विकल्प है कि तमिलनाडु की तरह दुकान पर बिना बायोमेट्रिक्स के स्मार्ट-कार्ड का प्रयोग हो।

जब दुकान पर वितरण होता है, तब एक साथ कई लोगों के उपस्थित होने से चोरी कठिन हो जाती है। तोल में बेईमानी करने पर हल्ला करने के लिए बीसियों लोग खड़े होते हैं। यदि घर पर अनाज का वितरण होगा, तो बेईमानी रोकने में कौन साथ होगा?

दिल्ली सरकार का प्रस्ताव है कि वह गेहूं के बजाय आटा देगी, जबकि यह स्पष्ट नहीं है कि कार्डधारक गेहूं चाहते हैं या आटा? खाद्य सुरक्षा कानून में गेहूं का दाम 2 रु. प्रति किलो निर्धारित है। आटा 4 रुपए प्रति किलो देने का प्रस्ताव है। यानी, पिसाई का थोक-भाव का खर्च, सरकार फुटकर के दाम से लोगों से वसूलेगी।

आटा देने में और बड़ी दिक्कत है। जब लोग गेहूं लेते हैं तो उसकी गुणवत्ता परखने में आसानी होती है। यदि आटा दिया जाएगा, और वह भी प्री-पैक्ड थैलों में, तो उसकी गुणवत्ता कैसे परखेंगे? पश्चिम बंगाल में आटा दिया जाता था और राज्य सरकार गुणवत्ता पर नियंत्रण नहीं रख पाई थी।

जन वितरण प्रणाली में अनाज की बोरी राशन डीलर के लिए कमाई का बड़ा स्रोत है। यदि बोरियां नहीं रहेंगी, तो इस काम में नुकसान होने की गुंजाइश है। कुछ डीलर भ्रष्ट भी हैं- कटौती, ज्यादा पैसे वसूलना इत्यादि, लेकिन पिछले कुछ सालों में अनाज की चोरी घटी है। यदि डोर-स्टेप डिलीवरी होगी, तो क्या गारंटी है कि घर पर पहुंचने वाले कर्मी, डीलर की तरह भ्रष्ट नहीं होंगे? पैसे ज्यादा नहीं वसूलेंगे? उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी?

सवाल केन्द्र पर भी उठते हैं। देशभर से सर्वे रिपोर्ट आ रही हैं कि आधार के कारण लोग अपने हकों से वंचित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए लोकनीति के सर्वे में पाया कि 28% लोग आधार की वजह से राशन से वंचित हुए हैं। क्यों केंद्र सरकार ‘वन नेशन वन राशन’ (जो आधार पर ही चल सकता है) पर जोर दे रही हैं। स्मार्ट-कार्ड जैसे विकल्प का प्रयोग क्यों नहीं कर रही? दुख की बात है कि आम जनता की प्राथमिकताएं जैसे अनाज की चोरी, गुणवत्ता, राशन से वंचित होना डिबेट से बाहर है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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